Modern Indian Language – Assamese (आधुनिक भारतीय भाषा: असमिया)
IGNOU Bachelor of Arts (BAG Programme)
असमिया साहित्य का युग-विभाजन उसके ऐतिहासिक विकास, भाषा की संरचना, विषयवस्तु, साहित्यिक शैली तथा धार्मिक और सामाजिक प्रभावों के आधार पर किया जाता है। युग-विभाजन से असमिया साहित्य के क्रमिक विकास को स्पष्ट रूप से समझने में सहायता मिलती है। सामान्यतः असमिया साहित्य को चार प्रमुख युगों में विभाजित किया गया है— चर्यायुग, वैष्णव युग, आधुनिक-पूर्व युग तथा आधुनिक युग।
इनमें से चर्यायुग असमिया साहित्य का सबसे प्राचीन युग माना जाता है और यह शंकरदेव से पूर्व का काल है। इस युग की प्रमुख साहित्यिक रचनाएँ चर्यापद हैं, जिनकी रचना बौद्ध सिद्धाचार्यों द्वारा की गई थी। शंकरदेव से पूर्व के प्रमुख कवियों में लुइपा, कुक्कुरिपा, कन्हुपा, शबरपा तथा भुसुकुपा के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।
इन कवियों की रचनाएँ सहजयान बौद्ध धर्म से प्रभावित थीं। चर्यापदों में प्रतीकात्मक और गूढ़ भाषा के माध्यम से योग-साधना, आत्मज्ञान, इंद्रिय-नियंत्रण तथा सांसारिक जीवन की नश्वरता को व्यक्त किया गया है। यद्यपि इन पदों की भाषा सरल प्रतीत होती है, परंतु इनके अर्थ अत्यंत गहरे और दार्शनिक हैं। शंकरदेव से पूर्व के इन कवियों की साहित्यिक कृतियाँ असमिया साहित्य की सबसे प्राचीन और सशक्त नींव मानी जाती हैं।
बैलाड लोकसाहित्य की एक महत्वपूर्ण विधा है। बैलाड वह लोकगीत होता है, जिसमें किसी कथा, ऐतिहासिक घटना, प्रेम-प्रसंग, वीरता या करुण घटना को गीतात्मक रूप में प्रस्तुत किया जाता है। बैलाड मुख्यतः मौखिक परंपरा से पीढ़ी दर पीढ़ी प्रचलित रहता है। असमिया भाषा में बैलाड को लोकगाथा या कहानीगीत के नाम से भी जाना जाता है।
‘नाहरोर गीत’ असमिया लोकसाहित्य का एक प्रसिद्ध बैलाड है। इस गीत में नाहर नामक युवक की वीरता, साहस और उसके दुखद अंत का मार्मिक चित्रण किया गया है। यह गीत समाज के सामान्य लोगों के जीवन, संघर्ष और भावनाओं को उजागर करता है।
‘नाहरोर गीत’ के आधार पर बैलाड की प्रमुख विशेषताएँ स्पष्ट होती हैं। इसमें सरल और सहज भाषा का प्रयोग हुआ है, जिससे सामान्य जनता इसे आसानी से समझ सकती है। गीत में कथा-प्रधानता, भावनात्मक गहराई, करुण रस तथा पंक्तियों की पुनरावृत्ति मिलती है। यह गीत लिखित रूप में नहीं, बल्कि मौखिक परंपरा के माध्यम से पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ा है, जो बैलाड की सबसे महत्वपूर्ण पहचान है। इस प्रकार ‘नाहरोर गीत’ असमिया भाषा का एक उत्कृष्ट लोकबैलाड है।
‘बाँह फूलर गंध’ कहानी में लेखक ने अरुणाचल प्रदेश के जनजातीय समाज के जीवन का यथार्थ और संवेदनशील चित्रण किया है। कहानी में जनजातीय लोगों का जीवन प्रकृति पर आधारित दिखाया गया है। उनका जंगल, बाँस, पहाड़ और प्राकृतिक संसाधनों से गहरा संबंध है। वे सरल जीवन जीते हैं और आपसी सहयोग, सामूहिकता तथा पारंपरिक रीति-रिवाजों का पालन करते हैं।
जनजातीय समाज की जीवन-शैली उनकी सांस्कृतिक पहचान को दर्शाती है। उनका भोजन, आवास, पहनावा और सामाजिक संबंध प्रकृति के साथ सामंजस्य स्थापित करते हैं। वे आधुनिक सुविधाओं से दूर रहते हैं और परंपरागत विश्वासों तथा लोक-ज्ञान पर अधिक निर्भर होते हैं। कहानी में यह स्पष्ट किया गया है कि यह समाज शांत, सरल और आत्मनिर्भर है।
कहानी का एक महत्वपूर्ण पक्ष प्लेग महामारी है। प्लेग के फैलने से जनजातीय समाज में भय और असहायता का वातावरण बन जाता है। चिकित्सा सुविधाओं के अभाव, अज्ञानता और अंधविश्वास के कारण यह बीमारी तेजी से फैलती है। महामारी के कारण अनेक लोगों की मृत्यु हो जाती है, जिससे सामाजिक ढाँचा बिखरने लगता है।
प्लेग का प्रभाव केवल शारीरिक नहीं बल्कि मानसिक और सामाजिक भी है। लोग भयभीत हो जाते हैं, परिवार उजड़ जाते हैं और जीवन में निराशा फैल जाती है। लेखक ने इस कहानी के माध्यम से यह दिखाया है कि प्राकृतिक आपदाएँ और बीमारियाँ सबसे अधिक कमजोर और हाशिए पर रहने वाले समाज को प्रभावित करती हैं। इस प्रकार ‘बाँह फूलर गंध’ जनजातीय जीवन और महामारी की त्रासदी का मार्मिक और प्रभावशाली चित्र प्रस्तुत करती है।
चर्यापद असमिया साहित्य की सबसे प्राचीन काव्य-परंपरा मानी जाती है। इसकी रचना आठवीं से बारहवीं शताब्दी के बीच बौद्ध सिद्धाचार्यों द्वारा की गई थी। ये पद सहजयान बौद्ध दर्शन से प्रभावित हैं और प्रतीकात्मक, गूढ़ भाषा में आध्यात्मिक सत्य को व्यक्त करते हैं। चर्यापदों का मुख्य उद्देश्य मनुष्य को सांसारिक मोह से मुक्त कर आत्मज्ञान और मोक्ष के मार्ग की ओर प्रेरित करना है।
चर्यापदों की भाषा साधारण प्रतीत होती है, किंतु उनके अर्थ अत्यंत गहरे और दार्शनिक होते हैं। इनमें योग-साधना, इंद्रिय-नियंत्रण, आत्मसंयम और जीवन की नश्वरता का बार-बार उल्लेख मिलता है। इसी कारण चर्यापदों को केवल साहित्यिक नहीं, बल्कि आध्यात्मिक रचनाएँ भी माना जाता है।
‘काआ तरुबर पचोबी डाल’ एक प्रसिद्ध चर्यापद है। इसमें ‘काआ तरु’ मानव शरीर का प्रतीक है, जबकि उसकी पाँच शाखाएँ पाँच इंद्रियों (आँख, कान, नाक, जीभ और त्वचा) को दर्शाती हैं। कवि का आशय यह है कि मनुष्य यदि अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण नहीं रखता, तो वह सांसारिक सुखों और मोह में फँसकर जीवन के वास्तविक उद्देश्य को भूल जाता है।
इस चर्यापद के माध्यम से कवि आत्मसंयम, साधना और आत्मबोध का संदेश देता है। भौतिक सुख क्षणिक हैं, जबकि सच्चा ज्ञान और शांति केवल आध्यात्मिक चेतना से ही प्राप्त की जा सकती है। इस प्रकार ‘काआ तरुबर पचोबी डाल’ जीवन की नश्वरता और मोक्ष-प्राप्ति के मार्ग को प्रतीकात्मक ढंग से स्पष्ट करता है तथा असमिया साहित्य में चर्यापदों के दार्शनिक महत्व को सिद्ध करता है।